वर्तमान राजनीतिक दौर को देखते हुए बीकानेर मे यही हालात दिखाई पड़ रहे हैं।

जिस कदर टिकटों का बंटना बदलना ओर फिर कटना बीकानेर की साख के लिए भरी पड़ा बीकानेर जो को गंगा जमुनी तहजीब ओर भाईचारे के लिए छोटीकाशी के नाम से जाना जाता रहा है.

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वहीं बीकानेर को इस बार चुनावी रंग ओर राजनीति की नजर लग गई जिससे यहाँ आपसी भाईचारे को दरकिनार कर चुनावी दलों ओर बड़े नेताओं ने बीकानेरी भाईचारे मे फुट डाल कर शहर का माहोल बिगाड़ कर लोगों के मन मे द्वेष पैदा कर दिया है जिससे की एक समाज से किसी को टिकिट मिलता है तो दूसरे समाज के लोग नाराज हो कर दबाव बना टिकिट पा लेते हैं जब हम भी क्यों न हमारे समाज के प्रतिनिधि को समर्थन करें।

यहाँ तक की हाल ही चल रहे हालातों मे जहां जनता जनप्रतिनिधियों का मिलन चल रहा है वहीं जनप्रतिनिधि जान के खतरे का अंदेशा जता चुने जाने से पहले ही सुरक्षा की माँग कर रहे हैं।

जब जनप्रतिनिधियों को चुनाव से पहले ही इतना खतरा महसूश हो रहा है तब चुने जाने के बाद क्या स्थिति रहेगी ओर जनप्रतिनिधियों से समश्याओं को लेकर मिलने के लिए पहले आमजन को जांच करा कर मिलने दिया जाएगा फिर कैसे जनप्रतिनिधियों ओर आम जनता का आपसी संवाद बन पाएगा ?

वहीं हाल ही हुए चुनावी टिकटों के वितरण ओर उसके बाद बदलाव ओर कटाव की स्थिति को देख कुछ लोग यहाँ तक की यह भी कहने लगे हैं की जब माली समाज से जनसेवी व्यक्ति को टिकिट देकर काटा जा सकता है तो हम भी क्यों न बनिया समाज को एकत्रित कर ज़ोर क्यों न दिखाएँ वहीं बीकानेर पूर्व से चुनाव लड़ रहे कन्हेयाला झंवर के लिए भी अंदरूनी लोगों मे सुगबुगाहट शुरू हो गई है की इस बार माहेश्वरी जैन अग्रवाल समाज के सभी बनियों को एकत्रित कर समाज के प्रतिनिधि को आगे बढ़ाया जा सके।

वहीं कॉंग्रेस से बागी हुए गोपाल गहलोत ने बीकानेर पूर्व व पश्चिम से ताल ठोक दी है दूसरी ओर बीजेपी से बागी हुए युधिस्टर सिंह भाटी ने भी न साहब न साथी के स्लोगन से ताल ठोक रखी है।

लेखक आनन्द मोदी बीकानेर

नोट क्रप्या ध्यान दें लेखक का चुनाव ओर राजनीति से कोई वास्ता नहीं है ओर न ही लेखक किसी दल या किसी व्यक्ति का समर्थन या विरोध करता है।


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