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अकबर इलाहाबादी के समकालीनों का कहना है कि उनमें जिंदादिली इस कदर समाई हुई थी कि विकट परिस्थितियों में भी हास-परिहास का वातावरण पैदा कर देते थे और अपने रंगों से सबको सराबोर कर देते थे।

वृद्धावस्था में उनकी आंखों की रोशनी कुछ कमजोर हो गई तो उन्हें ऑपरेशन करवाना पड़ गया। ऑपरेशन के बाद डॉक्टर ने आंखों पर पट्टी बांधी और अपनी फीस लेकर चलता बना।

थोड़ी देर बाद साहबजादे हशरत हुसैन कमरे दाखिल हुए और अपने वालिद का हाल-चाल पूछा। ऐसे मौके पर भी अकबर इलाहाबादी परिहास करने से न चूके। उन्होंने उत्तर देते हुए अपने साहबजादे को यह शेर सुनाया-

रोशनी आये तो हम देखें कहीं अपना हिसाब,

वो तो दो सौ ले गए आंखों पे पट्टी बांध के।

तो, ऐसे जिंदादिल शायर थे अकबर साहब, जो मुर्दा दिल को भी हंसा देने का कला जानते थे।

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