करण जौहर एक ऐसे व्यक्ति हैं जो हरदम खुद को रिइन्वेन्ट करते ही रहते हैं। पहली फिल्म से सफल निर्देशक बनने वाले करण सिर्फ निर्देशन तक ही नहीं रुके बल्कि कई अन्य क्षेत्रों में भी हाथ आजमाया। एक्टिंग किया, शो होस्ट बने, प्रोडक्शन संभाल ही रहे हैं और कॉस्ट्यूम डिज़ाइनर भी बने। अपनी बायोग्राफी भी लिखी। अभी हम बात कर रहे हैं K फैक्टर पर। K अक्षर से कई लोगों का लगाव रहा है। एकता कपूर और राकेश रौशन का नाम भी इसी श्रेणी में आता है। इन लोगों ने भी K से ही कई फिल्म और सीरियल बनाए हैं।

Third party image reference

तो क्या है आम वजह?

अंधविश्वास एक ऐसी चीज है जिसे बिन पढे-लिखे लोग तो फॉलो करते ही हैं, पढे लिखे लोग भी करते हैं। बस फर्क ये है कि पढ़े-लिखे लोग अपने लिए कोई न कोई लॉजिक निकाल लेते हैं वहीं अनपढ़ लोग ऐसा नहीं कर पाते। तो कुछ लोग ऐसा कह सकते हैं कि शुरुआत में करण को भी यही लगा कि एक फिल्म K से चल गई तो फिर इसी को आगे बढ़ाते हैं।

कुछ कुछ होता है (1998)

कभी खुशी कभी गम (2001)

कल हो न हो (2003)

काल (2005)

कभी अलविदा ना कहना (2006)

हालांकि इसपर आपको यकीन नहीं होगा लेकिन फिर भी हम आपको बताते हैं कि इसकी असली वजह या हो सकती है? ये तो आपको पता ही होगा कि करण जौहर के शुरुआती 5 फिल्मों के नाम के से ही शुरू होते थे। लेकिन ये स्थिति सन 2006 के बाद बदल गई। लेकिन 2006 में ऐसा क्या हुआ? आइए बताते हैं।

Third party image reference

क्या है असली वजह?

असली वजह ये है कि उसी साल फिल्म ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ आई थी। और उस फिल्म में एक कैरेक्टर था कुलभूषण खरबंदा का। उस कैरेक्टर की ये खासियत थी कि वो अपने पंडित बटुक महाराज से कंसल्ट किए बिना कोई काम नहीं करते थे। और फिर खुराना ने अपने नाम से एक एक्स्ट्रा K को हटा दिया। उसे देखकर करण जौहर ने भी हटा दिया।

The content does not represent the perspective of UC