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भारत का संविधान विश्व के सभी देशों से बड़ा है। इस तैयार करने में कुल 2 वर्ष 11 महीने 18 दिन लगे थे। देश का संविधान 26 नवम्बर, 1949 को संविधान सभा द्वारा पारित किया गया और 26 जनवरी, 1950 को प्रभावी था। इस समय देश के मूल संविधान में कुल 395 अनुच्छेद (अब 465 अनुच्छेद) और 12 अनुसूचियां हैं, जोकि 22 भागों में विभाजित हैं। भारतीय संविधान में अब तक 123 संशोधन हो चुके हैं। भारतीय संविधान को वैश्विक स्तर पर बेहद सराहा गया है। लेकिन, विडम्बना का विषय है कि देश के संविधान में कुछ ऐसे अनुच्छेद एवं धाराएं हैं, जो विवादों में रहते हैं, जिनमें अनुच्छेद 370, 35A, 356 और धारा 377 आदि शामिल हैं।

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क्या है अनुच्छेद 370 और धारा 35A?

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 के अंतर्गत जम्मू-कश्मीर राज्य को कुछ विशेषाधिकार दिए गए हैं। जैसे कि भारत के अन्य राज्यों के लोग जम्मू कश्मीर में जमीन नहीं खरीद सकते हैं। वित्तीय आपातकालीन अनुच्छेद 360 और राष्ट्रपति शासन लागू की जाने धारा 356 इस राज्य में लागू नहीं की जायेगी। यदि कश्मीर की लड़की अन्य राज्य के लड़के से शादी करेगी तो उसकी कश्मीरी नागरिकता स्वतः छीन जायेगी।

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अनुच्छेद 370: क्या है विवाद की जड़?

मूल विवाद की जड़ अनुच्छेद 370 के अंतर्गत धारा 35A है। 14 मई, 1954 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के आदेश पारित किया गया था, जिसके जरिए भारत के संविधान में एक नया धारा 35A जोड़ दिया गया। यह धारा जम्मू-कश्मीर सरकार और वहां की विधानसभा को स्थायी निवासी की परिभाषा तय करने का अधिकार देता है। इसका अर्थ है कि राज्य सरकार को यह अधिकार है कि वो आजादी के वक्त दूसरी जगहों से आए शरणार्थियों और अन्य भारतीय नागरिकों को जम्मू-कश्मीर में किसी तरह की सहुलियत दे अथवा न दे। वर्ष 1956 में जम्मू कश्मीर का संविधान बनाया गया, जिसमें स्थायी नागरिकता को परिभाषित करते हुए तय किया गया कि स्थायी नागरिक वो व्यक्ति है, जो 14 मई, 1954 को राज्य का नागरिक रहा हो या फिर उससे पहले के 10 वर्षों से राज्य में रह रहा हो और साथ ही उसने वहां सम्पत्ति हासिल की हो।

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अनुच्छेद 370 के धारा 35A हटाने की मांग क्यों?

अनुच्छेद 370 के धारा 35A को हटाने की पुरजोर मांग देशभर में लंबे समय से चल रही है। इसका विरोध करने वालों का कहना है कि पहली बात यह है कि इसे संसद के जरिए लागू नहीं करवाया गया। दूसरी यह है कि राज्य सरकार भारतीय नागरिकों को संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों से वंचित कर रही है और भारतीय नागरिकों से भेदभाव बरत रही है। संपत्ति खरीदने व विवाह जैसे नियम लागू किए जाने से लोगों को के साथ अन्याय हो रहा है। जबकि, धारा 35A के पक्ष में जम्मू-कश्मीर के सियासतदार झण्डा बुलन्द कर रहे हैं और भयंकर धमकियां दे रहे हैं। राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती सीधी धमकी दे चुकी हैं कि यदि अनुच्छेद 370 के साथ छेड़छाड़ की गई तो जम्मू-कश्मीर में तिरंगा थामने वाला कोई नहीं रहेगा। लोकसभा सांसद फारूक अब्दूला ने धमकी दी है कि यदि धारा 35A को रद्द किया गया तो जनविद्रोह की स्थिति पैदा हो जायेगी। सबसे बड़ी बात यह कि भाजपा की जम्मू-कश्मीर की महिला उपाध्यक्षा यहां तक कह चुकी हैं कि यदि अनुच्छेद 370 के साथ छेड़छाड़ की गई तो कश्मीर के लोग हाथों में बन्दूक उठा लेंगे।

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क्या है अनुच्छेद 356?

अनुच्छेद 356 केन्द्र सरकार को किसी राज्य सरकार को बर्खास्त करने और राष्ट्रपति शासन लगाने की अनुमति, उन परिस्थितियों में देता है, जब राज्य का संवैधानिक तंत्र पूर्ण रूप से विफल हो गया हो। साधारण शब्दों में किसी भी अशांत हो चुके राज्य में संविधानिक तंत्र को स्थापित करने के लिए राष्ट्रपति शासन इस अनुच्छेद के तहत केन्द्र सरकार द्वारा लगाया जाता है।

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अनुच्छेद 356: क्या है विवाद की जड़?

जब भी अनुच्छेद 356 का प्रयोग होता है तो सत्तारूढ़ केन्द्र सरकार को विपक्षी पार्टियों की आलोचना का शिकार होना पड़ता है और सत्ता का दुरूपयोग करने जैसे गम्भीर आरोपों का सामना करना पड़ता है। क्योंकि, आमतौर पर राष्ट्रपति शासन उन राज्यों में लगाया जाता है, जहां केन्द्र में सत्तारूढ़ पार्टी सत्ता में नहीं होती। लेकिन, अपवाद के तौरपर वर्ष 1983 में पंजाब और वर्ष 1973 में आन्ध्र प्रदेश में दोनों जगह कांग्रेस की सरकार होते हुए, राष्ट्रपति शासन लागू किया गया था। अब तक विभिन्न राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में कुल 123 बार राष्ट्रपति शासन लग चुका है। 26 जनवरी, 2016 को अरूणाचल प्रदेश और 27 मार्च, 2016 को उत्तराखण्ड में ‘संविधानिक संकट’ करार देकर भाजपा की केन्द्र सरकार की सिफारिश पर राष्ट्रपति शासन लगा तो कांग्रेस सहित विपक्षी पार्टियों ने केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार पर अनुच्छेद 356 के दुरूपयोग का सीधा आरोप जड़ते हुए लोकतंत्र को खतरे में बता डाला। इसके प्रत्युत्तर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विपक्षी पार्टी कांग्रेस को संसद में करारा जवाब देते हुए कह दिया कि इस देश में 90 से अधिक बार अनुच्छेद 356 का उपयोग करते हुए आपने राज्य सरकारों को और राज्य के दलों को उखाड़कर फेंक दिया। आप किस लोकतंत्र की बात करते हो?

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क्या है धारा 377?

भारतीय दंड संहिता की धारा 377 समलैंगिक यौन सम्बंध स्थापित करने को अपराध करार देती है। इस धारा के तहत जो कोई भी किसी पुरूष, महिला या पशु के साथ प्रकृति की व्यवस्था के खिलाफ सेक्स करता है, तो इस अपराध के लिए उसे 10 वर्ष की सजा या आजीवन कारावास से दण्डित किया जा सकेगा और जुर्माना भी लगाया जायेगा। दिल्ली उच्च न्यायालय ने 2009 में एक फैसले में कहा था कि आपसी सहमति से समलैंगिकों के बीच बने यौन सम्बंध अपराध की श्रेणी में नहीं होंगे। लेकिन, वर्ष 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने इस फैसले को पलटते हुए समलैंगिक सम्बंधों को आईपीसी की धारा 377 के तहत ‘अवैध’ करार दे दिया।

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धारा 377: क्या है विवाद की जड़?

समलैंगिक यौन सम्बंध के पक्षधरों का कहना है कि धारा 377 को अवैध ठहराया जाए, क्योंकि यह निजता के अधिकार का सीधा उल्लंघन है। इस मांग ने तब और अधिक जोर पकड़ा जब अगस्त, 2017 में सर्वोच्च न्यायालय ने ‘राईट टू प्राईवेसी’ पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। सर्वोच्च न्यायालय ने निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार मानते हुए कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 के मूल में निजता का अधिकार है, क्योंकि सेक्स सम्बंधी पसन्द भी उसी में शामिल है। धारा 377 को अवैध करार देने की मांग करने वालों का तर्क है कि आस्ट्रेलिया, माल्टा, जर्मनी, फिनलैंड, कोलंबिया, आयरलैंड, अमेरिका, स्कॉटलैंड, दक्षिण अफ्रीका, इंग्लैण्ड और वेल्स, ब्राजील, डेनमार्क, उरूग्वे, नीदरलैंड, न्यूजीलैण्ड, आईसलैंड, स्पेन, कनाडा, बेल्जियम, लक्जमबर्ग, नार्वे आदि 26 देशों ने समलैंगिक सेक्स को अपराध की श्रेणी से हटा दिया है।

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