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शायर इकबाल अपनी जिन्दगी में एक बहुत ही खुशमिजाज और जिंदादिल इन्सान थे। हर महफिल में उनकी वाक्पटुता और शायरी रंग ला देती थी।

एक बार उनसे मिलने एक मौलवी साहब पधारे। बातों के सिलसिले में संगीत की चर्चा छिड़ गई। वह हजरत औरतों के गाना गाने का बड़ा जबरदस्त विरोध कर रहे थे। कहने लगे कि औरतों का गाना सुनने से भावनाएं उत्तेजित हो जाती हैं। इतना ही नहीं, उनका चेहरा और हाव-भाव देखकर कामुकता तीव्र हो उठती है, मन काबू में नहीं रह जाता है।

इकबाल ने त्वरित जवाब देते हुए कहा कि ऐसी महफिलों में तब आप आंखों पर पट्टी बांधकर और लंगोट कसकर जाया कीजिए। ऐसी हालत में सिर्फ आपके कान खुले रहेंगे। इस तरह आप गाने का मजा भी ले सकेंगे और अपने चाल-चलन पर काबू भी कर सकेंगे।

मौलवी साहब शर्म से पानी-पानी होकर लौट गए।

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