दोस्तों भारतीय लोग पगार के मामले में सबसे कमजोर लोग बन चुके है। यहाँ पगार देने का कोई सरल तरीका नहीं रहा है। हर कोई किसी की मज़बूरी को लेकर उसका फायदा उठा रहे है। यहाँ पर एक ही कंपनी में फ्रेशर को अनुभवी व्यक्ति से ज्यादा पगार दिया जाता है। और वही फ्रेशर को उसी अनुभवी व्यक्ति के निचे काम करने को कहा जाता है। और जब पगार बढ़ने के बात अति है तो अनुभवी व्यक्ति को जॉब छोड़ने को कहा जाता है। यह सबसे विचित्र बात है।

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और एक मजेदार बात यह है की भारत में कॉन्ट्रैक्ट जॉब है। पर यह कोई सरल चीज़े नहीं है। यहाँ पर मनो 'A' कंपनी ने किसी व्यक्ति को काम पर रखा है। पर यह आदमी को 'A' कंपनी का नाम नहीं मिलेगा उसे 'B' कंपनी के नाम पर रखा जाता यही। और कहानी यही नहीं रूकती। लोग इसे और उलझा देते है जब उसे 'B' कंपनी का भी नाम नहीं दिया जाता। उसे 'C' कंपनी के नाम से लेटर, पहचान पत्र यानि ID और पगार दिया जाता है। मतलब सरल भाषा में थर्ड पार्टी के थर्ड पार्टी या कांट्रेक्टर के कांट्रेक्टर पर इन्हे रखा जाता है। और इसमें एक आदमी का पैसा २ कांट्रेक्टर खा जाते है। एक व्यक्ति सीधा 'A' कंपनी का काम करता है और उसे सँभालने के लिए २ कांट्रेक्टर पैसा लेते है उर्फ़ कहते है।

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हमारे यहाँ जॉब्स की कमी है और इसमें इतनी गंदी बाते होती रहती है। हर कोई कंपनी यह नहीं करती यह पर लोगों को कॉन्ट्रैक्ट पर लेना एक ट्रेंड बनता जा रहा है और इसका फायदा काम करने वाले को नहीं बल्कि कांट्रेक्टर को हो रहा है।

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